लंबी कानूनी लड़ाई से मकान मालिक की जरूरत खत्म नहीं होती-सुप्रीम कोर्ट लंबी कानूनी लड़ाई से मकान मालिक की जरूरत खत्म नहीं होती। 40 साल पुराने पीलीभीत विवाद में हाईकोर्ट का फैसला रद्द। किरायेदार को 30 दिनों के भीतर संपत्ति खाली करने का निर्देश।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी किरायेदार के खिलाफ दशकों तक चलने वाली कानूनी लड़ाई का यह मतलब नहीं है कि मकान मालिक की अपनी संपत्ति पाने की वास्तविक और जायज जरूरत खत्म हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से जुड़े करीब 40 साल पुराने मकान मालिक किरायेदार विवाद का निपटारा करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश रद्द कर दिया और किरायेदार को संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया।
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने निचली अदालत द्वारा पूर्व में दिए गए बेदखली के आदेश को पूरी तरह बहाल कर दिया। पीठ ने कहा, 'समय बीतने के साथ शुरुआती तकनीकी बाधाएं समाप्त हो जाती हैं और अदालतों में लंबे समय तक खिंचने वाला मुकदमा मकान मालिक की वास्तविक आवश्यकता को समाप्त नहीं कर सकता।
' मकान मालिक ने जुलाई 1984 में इस संपत्ति का मालिकाना हक हासिल किया था। इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश शहरी भवन अधिनियम 1972 के तहत किरायेदार को नोटिस भेजा और तीन साल के अंदर जगह खाली करने के लिए कहा। 1998 में तय अथॉरिटी के सामने भरोसा दिलाने के बावजूद किरायेदार ने जगह खाली नहीं की।
मकान मालिक ने 2010 में बेदखली की प्रक्रिया शुरू की। उन्होंने बताया कि उन्हें अपने बेटे जो एक न्यूरोसर्जन हैं, के लिए मेडिकल क्लिनिक खोलने के वास्ते इस जगह की जरूरत हैं। दिसंबर 2012 में, अथॉरिटी ने मकान मालिक की जरूरत को सही माना और बेदखली का आदेश दिया।
अपीलीय अथॉरिटी ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। किरायेदार ने इसके खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट ने मार्च 2025 में निचली अदालतों के आदेशों को रद्द कर दिया, जिसके बाद मकान मालिक ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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